आप मेरे गांव में भी आके देख लो हे राम ,
कैसे-कैसे कष्ट यहां झेलती हैं बेटियां ।
प्यार वाले दायरे से दूर होकर अंगना में ,
आंसुओं से चुपचाप खेलती हैं बेटियां ।।
जिंदगी की सूखी हुई झील के किनारे तक ,
स्वाभिमान का शिकार ठेलती हैं बेटियां ।
बहू, बेटी ,बहन और मां के रूप में हमेशा ,
दोनों वक्त वाली रोटी बेलती हैं बेटियां ।।