दिल के जैसा निशान, है ही नहीं ,
ये तो पत्ता है, पान है ही नहीं ।
उस जगह पर तो सिर्फ कब्जा है,
वो ख़ुदा का मकान है ही नहीं ।
भागे हम भी थे तीर से डरकर ,
ये न देखा, कमान है ही नहीं ।
जिसके घर, बैल, हल, नहीं होते ,
वो असल में किसान है ही नहीं ।
ये ‘चरौरा’ भी दोगला निकला ,
फौज वाला जवान, है ही नहीं ।