मेरा गांव मेरा देश

पाँच सितारा इक होटल में, मैने अपने गांव को देखा ।।

खट्टे बेरों वाली झाड़ी,

दो गमलों में लगी हुई थी ।

एक पुरानी घोड़ा गाड़ी,

दरवाजे पर खड़ी हुई थी ।

शीशे की सब दीवारों पर, काली – पीली छांव को देखा,

पहली मंजिल पर देखा था,

चूल्हे से बतियाता आँगन,

सुबह की सरगम वाली चाखी,

गिड़गम की धुन वाला मक्खन !

आज आपको बतलाता हूँ,इन आँखों ने जो-जो देखा !

दरवाजे के ठीक सामने ,

बुग्गी की तस्वीर लगी थी ।

बारिश की बूंदों में बहती,

कागज वाली नाव छपी थी !

पत्थर की कुछ तस्वीरों में, पायल वाले पांव को देखा ।

चिमटा और फूंकनी वाला,

बावर्ची ने चित्र दिखाया !

गेंदतड़ी और गिल्ली डंडा,

भोजन की मेजों पर पाया !!

और जिसे मैं भूल गया था, तस्वीरों में वो- वो देखा !

केवल हुक्का छपा हुआ था,

गुड़गुड़ को छपवा नहीं पाए !

दादा की खाँसी का गर्जन,

चित्रों में दर्शा नहीं पाए !!

कुर्रम की जूती की चुरमुर, चुरमुर सुनती ठाँव को देखा !

बाथरूम की दीवारों पर,

गाँव ‘चरौरा’ की पोखर थी।

धोबन की वो छैय्या- छैय्या,

गीतों में सबसे ऊपर थी !!

मन्दिर वाली शंख ध्वनि की,धुन में रमते गाँव को देखा !

पांच सितारा इक होटल में,

मैने अपने गाँव को देखा !!

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