बिटिया का भाग्य

मुद्दतों के बाद बेटी, माँ से मिलने गांव आयी ।

भाई की आवाज सुनकर, भाई को पहचान पाई ।।

लाडली को देखते ही,

प्रेम का सागर यूँ छलका ।

मां के मन का वृद्ध पंछी

दूर उड़ जाने को मचला ।।

बंद पलकों में खुशी के

दीप सब जलने लगे थे ।।

प्रेम के प्यासे परिंदे,

स्वयं ही पलने लगे थे ।

बीच आंगन में खटोले पर पड़ी मां फड़फड़ायी ।

मुद्दतों के बाद बेटी, आज अपने गांव आयी ।।

भाई से नाराज़गी का

प्रश्न करना चाहती थी ।

मौन रहकर उत्तरों से

पृष्ठ भरना चाहती थी ।।

भाई को देखा तो अपना,

वो लड़कपन याद आया ।

दर्द का कोई भी अक्षर,

पेट से बाहर न आया ।।

देख कर दुख दर्द मां का, दर्द अपना कह न पायी ।

मुद्दतों के बाद बेटी , आज अपने गांव आयी ।।

रुक न पाए मन के आंसू,

आंख से झर- झर झरे थे ।

बन्द पलकों से निकलकर,

पांव पर जाकर गिरे थे ।।

आज उसके तन बदन में,

दो तरह के घाव देखे ।

क्रोध के संग में ख़ुशी के

आते -जाते भाव देखे ।।

प्रेम की दीवार गिरने को अचानक भरभरायी ।

मुद्दतों के बाद बेटी, आज अपने गांव आयी ।।

फिर अचानक बूढ़ी मां ने

अनमने कुछ प्रश्न दागे ।

क्या हुआ बेटी? जो मेरे

पास आई भागे -भागे ।।

भाग्य से भयभीत होकर,

एक दिन माँ भी डरी थी ,

घर पिता का छोड़कर वो,

अजनवी के घर चली थी ।।

होंठ ये कहने लगे तो आंख माँ की डबडबायी ।

मुद्दतों के बाद बेटी, मां से मिलने गांव आयी ।।

प्रेम वाली एक टहनी,

हाथ से पकड़े रही वो ।।

बेबसी के बंधनों को,

इस तरह जकड़े रही वो ।

फिर अचानक स्वप्न बनकर,

उस जहां में खो गयी वो,

भाई की बाहों में गिरकर,

दूर जग से हो गयी वो ।।

मोह की पगडंडियों पर, वो ‘चरौरा’ लडख़ड़ायी ।

मुद्दतों के बाद बेटी, माँ से मिलने गांव आयी ।।

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