गीत —

जब- जब बच्चे अपने घर के, जड़ कुटुंब ठुकराते हैं !

तब -तब इस पावन वसुधा पर,वृद्धाश्रम बन जाते हैं !!

धूप के आगे तेज हवा भी,

मद्धम होती जाती है !

घर में रक्खी रद्दी की

कीमत कम होती जाती है !!

जैसे माला में फूलों का ,

हार ज़रूरी होता है !

जीवन में भी हरा भरा ,

परिवार ज़रूरी होता है !!

जब -जब माँ और बाप ज़मीं पर बोझिल समझे जाते हैं !

तब -तब इस पावन वसुधा पर , वृद्धाश्रम बन जाते हैं !!

जिन लोगों ने सपने वारे,

ज़ालिम तेरे सपनों पर !

जिन लोगों ने शाम सवेरे

रक्खा तुझको पलकों पर !!

जिसने तुझ पर छाता रक्खा

बारिश की बौछारों में !

तूने उसको छोड़ दिया है,

लाकर क्यूँ अंगारों में !!

बेटा हो, पर बेटा भी

शैतान न हो तो अच्छा है !

वरना तो भगवान कोई

संतान न हो तो अच्छा है !!

किसी काँच की तरह से टूटे, जब -जब रिश्ते नाते हैं !

तब -तब इस पावन वसुधा पर वृद्धाश्रम बन जाते हैं !!

ये मुझको अधिकार नहीं है,

पिता पे मैं अनुबन्ध लिखूँ !

माँ की ममता के बदले में,

मैं कोई प्रतिबन्ध लिखूँ !!

मुझको देकर छाँव, धूप में

उसे सुलगते देखा है !

मैने अपनी माँ को अक्सर,

रातों जगते देखा है !!

अपने जीवन से ममता का,

मौसम तुम मत जाने दो !

मात -पिता को कभी ‘चरौरा,

वृद्धाश्रम मत जाने दो !!

जब मानव के भाव डूब, दुष्कर्मों में ढल जाते हैं !

तब -तब इस पावन वसुधा पर वृद्धाश्रम बन जाते हैं !!

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