राजनीति के तीनों बन्दर आये हैं बाजार में

राजनीति के तीनों बन्दर आये हैं बाजार में ।

तीनों के तन तर्र्म तर हैं राजनीति के प्यार में ।।

आँख बन्द हैं, कान बन्द हैं, लच्छेदार जुबान है ।

चौसर वाली कटु चालों में, कैद सभी की जान है ।।

नफ़रत के अंकुर बोने को, तीनों ही मजबूर हैं ।

प्यार मुहब्बत वाले पथ से, बन्दर कोसों दूर हैं ।।

शारीरिक संरचना है कुछ जयचंदी आकार में ।

राजनीति के तीनों बन्दर आये हैं बाजार में ।।

पहले बन्दर की आंखों में, लालच भरी लकीर है ।

और दूसरे के हाथों में , दोधारी शमशीर है ।।

बीच बजरिया नाच रहा है, बहरा बनकर तीसरा ।

तीनों मिलकर इक दूजे पर, फोड़ रहे हैं ठीकरा ।।

चौथा बंदर सोच रहा है, सब जायज़ है वार में ?

तीनों के तन तर्र्म तर हैं राजनीति के प्यार में ।।

गांधी जी के तीनों बन्दर आये हैं बाजार में ।।