मेरे देश में राम के मंदिर हैं,और बजरंगी रखवारे हैं ।
यहां खेल घृणा का बंद हुआ अब खुशियों के फव्वारे हैं ।
यहां राम लला का है पूजन,
यहां राम नाम के शंख बजे,
अब रामकथा के स्वर होंगे ।।
यहां सीता राम लखन आये,
अब स्वर्ग यहीं बन जाएगा ।
यहां लाखों दीप जले जल में ।
अब खुशियां हिन्द मनाएगा ।।
यहां नफ़रत है अहिरावण से,और राम सभी को प्यारे हैं !
यहां खेल घृणा का बंद हुआ, अब खुशियों के फव्वारे हैं।।
जहां भ्राता भरत सरीखे हों,
वहाँ राज पादुका करती हैं ।
जहां प्रेम से बेर चखे शबरी,
दिन रात साधना करती है ।।
जहां दूध की बहती हों नदियां ।
वहां राम लखन से लाल हुए !
जहां नेह के आंसू बरस रहे ,
वहां प्रेम से पूरित ताल हुए !!
अब राम की नगरी महक रही, और भक्त हुए मतवारे हैं !
यहां खेल घृणा का बंद हुआ, अब खुशियों के फव्वारे हैं ।
जब प्रेम के जल की हो वर्षा,
तब खिलते फूल जलाशय के !
जब प्रीत पनपती अम्बर तक,
तब भाव मचलते आश्रय के !!
जब सागर पार करें वानर,
तब पुष्प वाटिका खाक हुई।
जब राम नाम की हो निंदा ,
तब स्वर्ण की लंका राख हुई !!
जब भक्त विभीषण हों चिंतित,तब राम ने काज सँवारे हैं !
यहां खेल घृणा का बंद हुआ, अब खुशियों के फव्वारे हैं ।
जब जनक सुता को राम मिले,
तब उर्मिल के पति लखन हुए !
जब भरत मांडवी को भाये,
श्रुत कीर्ति के रिपुदमन हुए !!
जब राम लखन से हों भाई,
तब कण -कण शंकर होता है !
जब छप्पन इंची हों सीने,
तब युद्ध भयंकर होता है !!
जहां राम की होती है पूजा, वहां केवट चरण पखारे हैं !
यहां खेल घृणा का बंद हुआ, और खुशियों के फव्वारे हैं
जहां बात अयोध्या की होगी,
वहां चर्चा होगी वीरों की !
जहां हनुमत जैसे भक्त रहें,
वहां आभा संत फ़क़ीरों की !!
जहां गंगा के तट केवट हो ,
वहां राम स्वयं आ जाते हैं ! !
जहां राह न दिखती केवट को,
वहां राम जी राह दिखाते हैं !
दिन रात ‘चरौरा’ गीत लिखे, रस छंद हुए मतवारे हैं !
यहां खेल घृणा का बंद हुआ, और खुशियों के फव्वारे हैं